SIR: जानिए फॉर्म 7 का पूरा सच, राजनीतिक पार्टियों के बहकावे में आने से पहले पढ़ें ये खबर

टीम भारत दीप |
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किसी भी नागरिक को मतदाता बनने के एक फॉर्म 6 भरना होता है।
किसी भी नागरिक को मतदाता बनने के एक फॉर्म 6 भरना होता है।

भारत में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) 1951 के तहत निर्वाचन यानी चुनाव कराने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। जब चुनाव होगा तो उसके लिए पहले से तैयारी भी करनी होगी। तो, यह काम होता है लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत।

यूपी डेस्क। उत्तर प्रदेश में एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया को एक माह के लिए बढ़ा दिया गया है। यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इसकी वजह फॉर्म 6 के बढ़ते आवेदन और नोटिस की संख्या को बताया है। इसी बीच समाजवादी पार्टी ने फॉर्म 7 को लेकर निर्वाचन आयोग को पत्र लिखा है। उनका आरोप है कि सत्तारूढ़ बीजेपी के कार्यकर्ता सपा समर्थकों के नाम वाले फॉर्म 7 बीएलओ को भरकर दे रहे हैं। 

निर्वाचन की प्रक्रिया में आम जनता केवल तीन ही शब्द जानती है। वोट बनना, वोट कटना और वोट में सुधार। अब फॉर्म 7 की क्या पहेली है। इसे हम आपको विस्तार से बताते हैं। 

भारत में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) 1951 के तहत निर्वाचन यानी चुनाव कराने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। अब जब चुनाव होगा तो उसके लिए पहले से तैयारी भी करनी होगी। तो, यह काम होता है लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत , यानी चुनाव कैसे होगा, कौन-कौन सी सीट होगी और इस चुनाव में मतदाता यानी वोट कौन डालेगा। 

आसान भाषा में कहें तो मतदाता सूची निर्माण का कार्य आरपीए 1950 के तहत किया जाता है। 1950 के इसी कानून के तहत एक कानून और बनाया गया जिसे निर्वाचक पंजीकरण अधिनियम 1960 कहते हैं। इस कानून के तहत ही किसी भी नागरिक को मतदाता बनने के एक फॉर्म 6 भरना होता है। यानी आपको वोट बनवाना है तो आप फॉर्म 6 भरेंगे। 

इसके अलावा यदि किसी का नाम पहले से मतदाता सूची में है और उसका नाम कटवाना है या उस पर किसी को आपत्ति है तो फॉर्म 7 भरा जाता है। या कोई व्यक्ति फॉर्म 6 भर रहा है और आपको लगता है कि इसका नाम आपकी वोटर लिस्ट में कानूनन नहीं होना चाहिए तो भी आप फॉर्म 7 भर सकते हैं। सीधे तौर पर कहें कि वोट काटने के लिए फॉर्म 7 भरा जाता है। 

अब जानिए फॉर्म 7 की प्रक्रिया
ऐसा कतई नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति के नाम का फॉर्म 7 भर गया तो उसका नाम वोटर लिस्ट से कट ही जाएगा। ऐसे किसी भी भुलावे में आने से आपको बचना चाहिए। फॉर्म के जरिए केवल आपत्ति उठाई जा सकती है। 

यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने 6 फरवरी को बताया कि फॉर्म 7 केवल वही व्यक्ति भर सकता है जो उस विधानसभा क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में अपना नाम रखता है। यानी जिसका पहले से वोटर लिस्ट में नाम है वही दूसरे के नाम पर आपत्ति उठा सकता है। 

फॉर्म 7 भरते समय आपत्ति करने वाले को सबसे पहले अपना नाम और अपनी वोटर आईडी भी भरनी होती है जिससे ये साबित हो सके ये भी इसी विधानसभा में वोटर है या नहीं। साथ ही नीचे अपने हस्ताक्षर भी करने होते हैं। बीएलओ इसकी जांच करते हैं।

फॉर्म 7 के बाद क्या
यदि किसी मतदाता के नाम का फॉर्म 7 किसी व्यक्ति ने भरा है। तो सबसे पहले निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (AERO) दो नोटिस जारी करता है। एक नोटिस उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसके नाम पर आपत्ति उठाई जाती है। एक नोटिस उसे जो आपत्ति उठा रहा है। 

इसके बाद ईआरओ सुनवाई के लिए दिन, तारीख और स्थान तय करते हैं। जहां उन दोनों लोगो को उपस्थित रहना है जिन्हें नोटिस मिले हैं। साथ ही अपने साथ अपना-अपना पक्ष रखने के लिए सबूत भी लाने हैं। 

सुनवाई के बाद सबूतों के आधार पर ईआरओ यह निर्णय लेते हैं कि वोट कटना है या नहीं। इस प्रक्रिया में आम तौर पर 7 से  15 दिन का समय लग ही जाता है। इसलिए किसी के भी इस बहकावे में न आएं कि फलां ने फलां का वोट कटवा दिया। 

यदि शिकायत झूठी निकली
फॉर्म 7 के अंतर्गत झूठी सूचना देना एक दंडनीय अपराध है। आरपीए एक्ट 1950 के सेक्शन 31 में इसका प्रावधान है। इसलिए किसी के कहने पर आप कभी फॉर्म 7 मत भर देना जब तक कि स्वयं के पास ठोस प्रमाण न हों। 


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