बात-बात पर अपने पति पर शक करने वाली महिलाएं पढ़ लें इलाहाबाद हाईकोर्ट का ये आदेश
नौकरी के कारण दोनों का दूर रहना इसकी और वजह बना। धीरे-धीरे बात यहां तक पहुंची कि 2011 से पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे। पत्नी ने बच्चों को भी छोड़ दिया और वे मासूम अपने दादा-दादी के पास रहने लगे।
प्रयागराज। शक एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है। कई बार आपस में बातचीत न होना इसकी बड़ी वजह बन जाती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने भी एक ऐसा ही मामला आया जिसमें एक दंपति के बीच तलाक की वजह पत्नी का पति पर शक बन गया। मामला इतना बढ़ा कि आखिर कोर्ट को तलाक मंजूर करना पड़ा। लेकिन अपने आदेश में कोर्ट ने जो कहा वह सभी को जरूर पढ़ना चाहिए।
मामला उत्तर प्रदेश के वाराणसी का है। गुरूग्राम की एक निजी कंपनी में काम करने वाले डिप्टी मैनेजर की शादी वाराणसी की रहने वाली शिक्षिका से साल 2003 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई। दोनों के दो बेटे भी हैं। इसके बाबजूद पत्नी के मन में यह शक बैठ गया कि उसके पति के भाभी के साथ अवैध संबंध हैं।
नौकरी के कारण दोनों का दूर रहना इसकी और वजह बना। धीरे-धीरे बात यहां तक पहुंची कि 2011 से पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे। पत्नी ने बच्चों को भी छोड़ दिया और वे मासूम अपने दादा-दादी के पास रहने लगे।
2014 में पति ने क्रूरता के आधार पर वाराणसी के कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी दाखिल की। इसमें उसने आरोप लगाया कि पत्नी झगड़ालू और शंकालू स्वभाव की है। वह पति की भाभी के साथ पति पर अवैध संबंध का आरोप लगाती है। उसके माता-पिता और बच्चों के साथ भी क्रूरता का व्यवहार करती है।
बच्चे का छत से लटकाया, फेंकी गर्म दाल
पति ने अपनी अर्जी में साल 2009 की घटना का जिक्र किया जिसमें उसकी पत्नी ने उसके छोटे बेटे को छत से लटका दिया। उसकी बूढ़ी मां पर गर्म दाल भी फंेक दी।
इतना ही नहीं वह सुइसाइड नोट लिखकर झूठे मामले में उसे और उसके पूरे परिवार को फंसाने की धमकी भी देने लगी। पति ने इसकी वॉयस रिकॉर्डिंग कोर्ट में पेश की।
परिवार न्यायालय ने दिया ये आदेश
मामले में वाराणसी की फैमिली कोर्ट ने एक पक्षीय आदेश पारित करते हुए पत्नी को राहत प्रदान की थी। इसके बाद पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रूख किया। हाईकोर्ट में पत्नी ने यह स्वीकार किया कि उसके पति के उसकी भाभी से अवैध संबंध हैं। इसे पति गहरे अवसाद में चला गया। कोर्ट ने यह भ देखा कि पत्नी ने पति के भेजे नोटिस को लेने से इनकार कर दिया था।
सामाजिक और मानसिक हत्या
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बिना सबूत केवल शक के आधार पर अपने पति के चरित्र पर आरोप लगाना उसकी सामाजिक और मानसिक हत्या करने जैसा है। अगर पति ने वर्षाें तक कोई गिला-शिकवा नहीं किया इसका मतलब यह नहीं कि वह प्रताड़ित नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय समाज मे पुरूष अक्सर लोकलाज और बच्चों के भविष्य की खातिर नरक जैसी स्थिति झेलते हैं। ऐसा कहते हुए कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी मंजूर कर ली।