भारत की ट्रेनों में इंसान के साथ सफर कर रहा सबसे जहरीला सांप ‘किंग कोबरा‘, पढ़िए यह रिपोर्ट

टीम भारत दीप |

गोवा के पशु बचाव दल द्वारा बचाए गए 47 स्थानों का अध्ययन किया।
गोवा के पशु बचाव दल द्वारा बचाए गए 47 स्थानों का अध्ययन किया।

किंग कोबरा को भारत का राष्ट्रीय सरीसृप माना जाता है। इसकी प्रजाति को पूरे भारत में एक ही माना जाता था, हालांकि इसकी धारियों का पैटर्न अलग-अलग होता था, फिर भी इसे एक अलग प्रजाति नहीं माना जाता था।

एजूकेशन डेस्क। भारत में पश्चिमी घाट के घने जंगल किंग कोबरा का प्राकृतिक आवास हैं। किंग कोबरा आमतौर पर जंगलों में ही रहता है, क्योंकि उसे वहां शिकार, पानी और सुरक्षित स्थान मिल जाता है। हालांकि, एक ऐसा अध्ययन सामने आया है, जिससे जंगलों में रहने वाले किंग कोबरा की मौजूदगी इंसानों के बढ़ती दिखाई दे रही है और उसके संरक्षण पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बीबीसी हिंदी की खबर के अनुसार सूरत के वैज्ञानिक और सरीसृप विशेषज्ञ दिकांश परमार ने एक अनोखा शोध किया है. उनके अध्ययन से पता चला है कि भारत में नागराज कहे जाने वाले किंग कोबरा सर्प संभवतः ट्रेनों में सफ़र कर रहे हैं।

बता दें कि गोवा जाने वाली कई रेल लाइनें घने जंगलों से होकर गुजरती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि किंग कोबरा कभी-कभी शिकार या आश्रय की तलाश में पटरियों या ट्रेनों के पास आ जाते हैं। इस तरह वे प्रकृति से दूर ऐसे इलाकों में पहुंच जाते हैं जहां उनके लिए भोजन या सुरक्षित आश्रय नहीं होता।

दिकांश का शोध प्रतिष्ठित पत्रिका ‘बायोट्रोपिका‘ में भी प्रकाशित हुआ है, जो अमेरिका की पारिस्थितिकी और उसके संरक्षण और प्रबंधन विषयों पर शोध को कवर करती है। इस पत्रिका में प्रकाशित शोध से पता चलता है कि दुनिया का सबसे लंबा विषैला सांप, किंग कोबरा (ओफियोफैगस कालिंगा), अनजाने में लंबी दूरी की ट्रेनों में यात्रा कर रहा होगा।

इस पत्रिका के शोध की प्रामाणिकता इससे मालूम होती है कि यहां शोध प्रकाशित करवाना आसान नहीं है। इसमें शोध प्रकाशित होने की सफलता दर केवल 36 प्रतिशत है। इस अध्ययन से पता चलता है कि किंग कोबरा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव इस सांप प्रजाति की सुरक्षा, संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती पेश कर रहे हैं।

दिकांश परमार ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ मिलकर गोवा में किंग कोबरा के 47 स्थानों का अध्ययन किया, जिनमें से अधिकांश पश्चिमी घाट के दूरस्थ जंगलों में स्थित हैं। इसके लिए उन्होंने गोवा स्थित एनिमल रेस्क्यू स्क्वाड से भी मदद ली. यह स्क्वाड कई वर्षों से सांपों सहित जंगली जानवरों को बचाने का काम कर रहा है।

पांच रेलवे स्टेशनों के पास मिले किंग कोबरा

दिकांश परमार ने गोवा के पशु बचाव दल द्वारा बचाए गए 47 स्थानों का अध्ययन किया। इनमें से 18 स्थान उत्तरी गोवा में और 29 स्थान दक्षिणी गोवा में थे। अपने अध्ययन के बारे में जानकारी देते हुए बीबीसी को बताया कि किंग कोबरा को भारत का राष्ट्रीय सरीसृप माना जाता है। इसकी प्रजाति को पूरे भारत में एक ही माना जाता था, हालांकि इसकी धारियों का पैटर्न अलग-अलग होता था, फिर भी इसे एक अलग प्रजाति नहीं माना जाता था।

वैज्ञानिकों को संदेह था कि इसकी अन्य प्रजातियां भी होंगी। इसलिए, उन्होंने यहां, विशेष रूप से पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले कोबरा को ओफियोफैगस कालिंगा के रूप में मान्यता दी। यह सांप संरक्षित श्रेणी में आता है। बताया जाता है कि अगर यह सांप किसी व्यक्ति को काट ले तो वह पानी नहीं मांगता और लगभग तुरंत ही मर जाता है। इस अध्ययन में पाया गया कि ये सभी स्थान या तो रेलवे स्टेशन के पास थे या रेलवे लाइन के पास थे।

गोवा स्थित पशु बचाव दल ने 2002 से 2024 तक कुल 120 किंग कोबरा सांपों को बचाया। जब सभी स्थानों का अध्ययन किया, तो पाया कि उनमें से 47 रेलवे ट्रैक के आसपास थे। एक सांप गोवा के एक रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास मिला था।

गोवा में पशु बचाव दल के प्रमुख अमृत सिंह ने बीबीसी को बताया कि दक्षिण गोवा में चंदोर नाम का एक रेलवे स्टेशन है। वहीं से हमें एक किंग कोबरा के होने की सूचना मिली और हमने उसे बचाकर वन विभाग को सौंप दिया। वह घायल अवस्था में था। यह ऐसी जगह है जहां आमतौर पर ऐसे सांप नहीं देखे जाते।

दिकांश परमार कहते हैं, शोध के आधार पर, हमारी टीम ने एक नई रेलवे डिस्पर्सल हाइपोथिसिस प्रस्तावित की है। यह बताती है कि किंग कोबरा कभी-कभी जंगली पहाड़ी रेलवे यार्ड में चूहों या अन्य कीड़ों का शिकार करते समय मालगाड़ियों या यात्री ट्रेनों में चढ़ जाते हैं, और अनजाने में कई किलोमीटर दूर, पूरी तरह से अनुपयुक्त परिस्थितियों में पहुँच जाते हैं। 

जिस जगह हमने शोध किया, वहां आमतौर पर सांप नहीं रहते लेकिन दूर कर्नाटक के पास के जंगलों में ये सांपों की प्रजातियां पाई जाती हैं। हमने जो किंग कोबरा देखे, वे लगभग रेलवे स्टेशनों के आस-पास थे। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे किसी कारणवश रेलवे के रास्ते गोवा के आस-पास पहुंचे होंगे।


संबंधित खबरें