अब भाजपा से गठबंधन की बात पर मायावती ने कह दिया ये, मुस्लिम समर्थकों से अपील

टीम भारत दीप |

मैं सन्यास ले लूंगी लेकिन भाजपा से गठबंधन नहीं करूंगी।
मैं सन्यास ले लूंगी लेकिन भाजपा से गठबंधन नहीं करूंगी।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने आगामी विधान परिषद चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के समर्थन से जुड़े बयान पर अब सफाई दी है।

लखनऊ। सियासत में कुछ भी निश्चित नहीं है। कब, कौन, कहां पलटी मार दे किसी को पता नहीं होता। यही कारण है कि बीते दिनों भाजपा के साथ हाथ मिलाने की बात करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने माहौल भांपते हुए दो दिन में ही अपनी बात से पटली मार दी। 

अब तो वह भाजपा से गठबंधन के बजाय, राजनीति से संन्यास को बेहतर बता रही हैं। इसके पीछे मायावती से दलित वोटबैंक के छिटकने को कारण बताया जा रहा है। बता दें कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने आगामी राज्यसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के समर्थन से जुड़े बयान पर अब सफाई दी है। 

उन्होंने कहा कि विरोधी उनके बयान की गलत व्याख्या कर दुष्प्रचार कर रहे हैं। बसपा कभी भी भाजपा से मिलकर चुनाव नहीं लड़ने वाली। उन्होंने कहा कि मैं सन्यास ले लूंगी लेकिन भाजपा से गठबंधन नहीं करूंगी।

दरअसल सपा को हराने के मायावती के बयान के बाद सपा व कांग्रेस ने उनके बयान को तूल देना शुरू कर दिया था और बसपा के खिलाफ मुस्लिम वोटरों में माहौल बनाने की कोशिश की जिसके बाद मायावती ने सोमवार को मीडिया के जरिए सफाई दी। 

बसपा सुप्रीमो ने बिहार विधानसभा चुनाव, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव में इस बयान से हुए डैमेज को कंट्रोल करने की कोशिश की। उन्होंने कहा ‘वह राजनीति से सन्यास ले सकती हैं लेकिन भाजपा से मिलकर कभी चुनाव नहीं लड़ सकतीं। जब तक जिंदा हूँ, यह संभव नहीं है। हालांकि, बाद में उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि राजनीति से सन्यास नहीं लेंगी। वह बहुत मजबूत, तगड़ी और स्वाभिमानी हैं।’ 

बसपा अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस, सपा व भाजपा कितना भी दबाए वह दबने वाली नहीं हैं। वह पूंजीवादी, जातिवादी व संकीर्ण विचारधारा वाली ताकतों से मुकाबला करती रहेंगी। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस नए बयान के जरिए मायावती ने मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश की कि बसपा ने जब भी भाजपा से मिलकर सरकार बनाई, भाजपा का ही नुकसान हुआ और जब सपा सत्ता में आई तब भाजपा को फायदा हुआ। 

वहीं यहां मायावती ने कहा कि 1995 में जब मथुरा में आरएसएस व भाजपा के लोगों ने ईदगाह पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए नई परंपरा शुरू करनी चाही तो नहीं शुरू करने दिया। बाद में सरकार चली गई। मायावती ने कहा कि 2003 में भाजपा ने गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ने का दबाव बनाया जिस पर मिलकर चुनाव लड़ने की जगह बसपा ने सत्ता छोड़ने का फैसला किया। 

वहीं उन्होंने यह भी कहा कि बसपा ने हमेशा ही मुसलमानों को उनकी आबादी के हिसाब से टिकट देने के साथ ही सत्ता में भी हिस्सेदारी दी। उन्होंने याद दिलाया कि सात सीटों पर हो रहे उपचुनाव में भी बसपा के दो उम्मीदवार मुस्लिम हैं। 

मायावती ने कहा कि 2003 में जब भाजपा से मिलकर लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा तो केंद्र की तत्कालीन भाजपा सरकार ने सीबीआई व ईडी का उनके खिलाफ इस्तेमाल कर परेशान किया तब सोनिया गांधी ने फोन कर आश्वासन दिया था कि वह न्याय दिलाएंगी। उन्होंने कहा कि हमारे खून में दबना स्वीकार नहीं है। 

हमने तय किया कि कोर्ट में जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट गए, न्याय मिला। उन्होंने कहा कि 2003 में उनके साथ जो हुआ वो उसे भूली नहीं हैं। भाजपा के साथ जाने का तो सवाल ही नहीं। वहीं बसपा सुप्रीमों मायावती ने बताया कि सपा सरकार में गुंडाराज से लोग त्रस्त थे। 1995 में सभी दलों ने कहा कि वह सपा से बाहर आ जाएं तो सब समर्थन करेंगे। 

तब भाजपा व कांग्रेस सहित अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई पर, विचारधारा व मूवमेंट से समझौता नहीं किया। बसपा सुप्रीमोे ने इस चुनावी माहौल में मतदाताओं से अपील की है कि वे गुमराह न हों।


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