74 साल बाद भी अधूरा है आज़ादी का स्वप्न, बता रहे हैं अपने लेख में हमारे पाठक

टीम भारत दीप |
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किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करती हैं।
किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करती हैं।

क्यों हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश चले जाते हैं। आज हम एक युवा देश हैं, जो युवा प्रतिभा इस देश की नींव है वह पलायन को मजबूर क्यों है? क्या वाकई में हम आजाद हैं ? क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? आज आजादी के इतने सालों बाद भी हम आगे न जा कर पीछे क्यों चले गए। वो भारत देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था जिसका एक गौरवशाली इतिहास था।

अंकित अग्रवाल। इस वर्ष हमारा पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है... पूरा देश जानता है कि कैसे सैंकड़ो हिन्दुस्तानियों नें अपनी सोने की चिड़िया को अंग्रेजों की कैद से बचाने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया था।

कई दशकों के कड़े संघर्ष के बाद तब कहीं जाकर 15 अगस्त 1947 में हमें आजादी मिली। सन् 2021 में हमारे देश को आजाद हुए 74 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन उसके बावजूद आज भी एक सवाल मेरे दिल को झकझोर देता है......कि क्या आज भी हम पूरी तरह से आजाद हैं या नहीं? क्या हमें वह आजादी मिल पाई जिसके लिए बापू, भगत सिंह, लाल लाजपत राय, रानी लक्ष्मी बाई जैसे शूरवीरों और स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना पूरा जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया? क्या उन सेनानियों के सपने पूरे हो पाऐ? या आज भी 74 साल बाद हम सिर्फ आजाद हैं तो बस अंग्रेजों के शासनकाल से और इससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं...।

जवाब की तलाश में सिर्फ एक ही आवाज आती है कि नहीं....और जवाब में मिलता है कि हमारा देश तो सिर्फ राजनैतिक तौर पर आजाद हो गया लेकिन समाज की बुराईयों से आज भी मुक्त नहीं है। सिर्फ लोकतंत्र और प्रजातंत्र ही देश की आजादी नहीं है, सरकार को चुनने की आजादी ही स्वतंत्रता नहीं होती है।

चायवाले का प्रधानमंत्री होना और राष्ट्रपति का दलित होना ही स्वतंत्रता की पहचान नहीं है। यह तो महज हमारे संविधान का हम सभी देशवासियों पर उपकार है। संविधान से हमें अभिव्यक्ति की आजादी तो मिली.....परन्तु कहीं न कहीं आज भी हम समाज की कई उन बेड़ियों से बंधे हैं जिनसे हम आज तक कैद मुक्त नहीं हो पाए, जिस आजादी को पाने के लिए हमारे शूरवीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

आजादी के 74 साल बाद भी हमारे देश में आवाम आजाद नहीं है। देश तो आजाद हो गया, लेकिन देशवासी अभी भी बुराईयों की बेड़ियों के बन्धन में बन्धे हैं। ये बेड़ियां हैं सरकारी अव्यवस्था की, अज्ञानता की, जातिवाद की, धर्म की, आरक्षण की, गरीबी की, सहनशीलता की,आतंकवाद की,आर्थिक शोषण की, महिलाओं की असुरक्षा, आदि।

किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है, जब तक वहां के नागरिक आजाद न हों। आज क्यों इतने सालों बाद भी हम गरीबी में कैद हैं, क्यों जातिवाद की बेड़ियां हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं?, क्यों आरक्षण का जहर हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है? क्यों धर्म जो आपस में प्रेम व भाईचारे का संदेश देता है वही, आज हमारे देश में वैमनस्य बढ़ाने का कार्य कर रहा है, क्यों हम इतने सहनशील हो गए हैं कि कायरता की सीमा कब लांघ जाते हैं, इसका एहसास भी नहीं कर पाते? क्यों हम झूठ के सामने सर झुकाए खड़े रहते हैं।

क्यों हमारे देश में साक्षरता आज भी एक ऐसा लक्ष्य है जिसको हासिल करने के लिए योजनाएं बनानी पड़ती हैं? क्यों हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश चले जाते हैं। आज हम एक युवा देश हैं, जो युवा प्रतिभा इस देश की नींव है वह पलायन को मजबूर क्यों है?

क्या वाकई में हम आजाद हैं ? क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? आज आजादी के इतने सालों बाद भी हम आगे न जा कर पीछे क्यों चले गए। वो भारत देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था जिसका एक गौरवशाली इतिहास था, उसके आम आदमी का वर्तमान इतना भयावह क्यों है?किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करती हैं।

यही वह कारण है, जिस वजह से आजाद भारत आज भी कैद में है। फर्क बस इतना सा ही है कि तब अंग्रेजों की कैद में थे, आज अपनों की कैद में हैं। तब अंग्रेजी हुकुमत शासन करती थी आज भारतीय ही भारतीयों के साथ राजनीति के नाम पर शासन कर रहें है।

परन्तु जिस दिन हम सवा सौ करोड़ भारतीयों के दिल में यह अलख जगेगी कि हमें अपने क्षेत्रों और जातियों से ऊपर उठ कर सोचना है, उस दिन उसकी रोशनी  केवल भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में भी फैलेगी।जब हम स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो हम देशवासियों को आजाद होनो से कोई नहीं राक सकता और चंद्रशेखर आजाद की तरह सारे देशवासी भी आजाद हो जाऐंगे और सोने की चिड़िया इस तरह आजाद हो ही जाएगी।


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