नवरात्र छठा दिनः विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करती हैं मां कात्यायनी, ऐसे करें पूजा

टीम भारतदीप |
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मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी मानी गई हैं।
मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी मानी गई हैं।

कात्यायनी देवी दुर्गाजी का छठा अवतार हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि देवी ने कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। कात्यायनी की उपासना से भक्‍त को अपने आप आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां मिल जाती हैं।

लखनऊ। नवरात्र का पावन उत्सव मां की भक्ति से सराबोर है। चहुंओर इस पावन पर्व की छठा बिखरी है। आज नवरात्र का छठा दिन है। श्रद्धालुुओं ने मां के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना कर अपनी मन्नत मांगी। 

मां के मंदिरों में मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना को लेकर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ नजर आई। लंबी-लंबी कतारों में लगे लोगों ने मां के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूर्ण होने के लिए आशीर्वाद मांगा।

पंडित विनयशंकर मिश्र बताते हैं कि कात्यायनी देवी दुर्गाजी का छठा अवतार हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि देवी ने कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी मानी गई हैं।

शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में प्रयासरत भक्तों को माता की अवश्य उपासना करनी चाहिए। हिन्‍दू पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार मां कात्‍यायनी की पूजा करने से शादी में आ रही बाधा दूर होती है और भगवान बृहस्‍पति प्रसन्‍न होकर विवाह का योग बनाते हैं। 

पंडित मिश्र ने बताया कि कात्यायनी की उपासना से भक्‍त को अपने आप आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां मिल जाती हैं। साथ ही वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है। मां कात्‍यायनी की उपासना से रोग, शोक, संताप और भय नष्‍ट हो जाते हैं। 

उनके मुताबिक ऐसी मान्यताएं हैं कि महर्षि कात्‍यायन की तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर आदिशक्ति ने उनकी पुत्री के रूप में जन्‍म लिया था। इसलिए उन्‍हें कात्‍यायनी कहा जाता है। कहते हैं कि मां कात्‍यायनी ने ही अत्‍याचारी राक्षस महिषाषुर का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया था। 

पंडित विनय शंकर मिश्र बताते हैं कि मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है। इनकी चार भुजाएं हैं। मां कात्यायनी के दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में और नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। मां कात्‍यायनी सिंह की सवारी करती हैं।

मान्यताओं के अनुसार मां कात्‍यायनी को लाल रंग पसंद है। मान्‍यता है कि शहद का भोग पाकर वह बेहद प्रसन्‍न होती हैं। नवरात्रि के छठे दिन पूजा करते वक्‍त मां कात्‍यायनी को शहद का भोग लगाना शुभ माना जाता है। पूजन विधि का ज्रिक करते हुए पंडित मिश्र बताते हैं कि नवरात्रि के छठे दिन अच्छे से स्नान करके लाल या पीले रंग का वस्त्र पहनें। 

इसके बाद घर के पूजा स्थान पर देवी कात्यायनी की प्रतिमा स्थापित करें। अब गंगाजल से छिड़काव कर शुद्धिकरण करें, मां की प्रतिमा के आगे दिया रखें और हाथों में फूल लेकर मां को प्रणाम करके उनका ध्यान करें। इसके बाद उन्‍हें पीले फूल, कच्‍ची हल्‍दी की गांठ और शहद अर्पित करें।

धूप-दीपक से मां की आरती करें उसके बाद प्रसाद वितरित करें। षष्ठी तिथि के दिन देवी के पूजन में मधु का महत्व बताया गया है। इस दिन प्रसाद में मधु यानि शहद का प्रयोग करना चाहिए। इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप प्राप्त करता है।

मां कात्यायनी का उपासना मंत्र -

 
चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना।

कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि।।


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