गोमती रिवरफ्रंट घोटाला: यूं होते रहे कारनामे, आला अफसर साधे रहे चुप्पी

टीम भारत दीप |

आईएएस अधिकारियों की चुप्पी भी रहस्यमी रही।
आईएएस अधिकारियों की चुप्पी भी रहस्यमी रही।

यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के मुताबिक ये बहुत ही अहम सवाल है कि किस तरह से इतने बड़े घोटाले में अब तक किसी भी आईएएस अधिकारी का नाम सामने नहीं आया हैै। बताया गया कि 10 लाख रुपये से अधिक के खर्च में सीधे सीधे शासन का पर्यवेक्षण होता है। प्रमुच सचिव सिंचाई, प्रमुख सचिव वित्त और मुख्य सचिव की तो सीधी जिम्मेदारी बनती है, लेकिन छापेमारी केवल इंजीनियरों और ठेकेदारों के घर की जा रही है।

लखनऊ। सपा सरकार बने गोमती रिवर फ्रंट में घोटाले की चर्चा सीआईआई की तेज हुई जांच के बाद फिर लगातार सुर्खियां बन रही हैं। बताया जा रहा है कि घोटाले के दौरान आईएएस अधिकारियों की चुप्पी भी रहस्यमी रही। इसमें तत्कालीन प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल व बाद में मुख्य सचिव और लखनऊ के जिलाधिकारी राजशेखर नाम भी शामिल है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन दोनों अफसरों के सामने काम आधा अधूरा काम किया जाता रहा और ये दौरे पर दौरे करने में मशगूल रहे। साथ ही घोटाले होते रहे लेकिन इन्होंने अपने आंख और मुंह बंद रखे। इधर सीबीआई की चार्जशीट से लेकर मुकदमों तक से ये अफसर अब तक बचे रहे हैं।

यही नहीं प्रमुख सचिव वित्त और तत्कालीन मुख्य सचिव की भी जिम्मेदारी इस घोटाले के होने के पीछे बताई जा रही है, लेकिन आईएएस लाॅबी को इस पूरे घोटाले में साफगोई से बचाने की चर्चा भी अब मुखर होने लगी है।

वहीं मामले को लेकर यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के मुताबिक ये बहुत ही अहम सवाल है कि किस तरह से इतने बड़े घोटाले में अब तक किसी भी आईएएस अधिकारी का नाम सामने नहीं आया हैै। बताया गया कि 10 लाख रुपये से अधिक के खर्च में सीधे सीधे शासन का पर्यवेक्षण होता है।

प्रमुच सचिव सिंचाई, प्रमुख सचिव वित्त और मुख्य सचिव की तो सीधी जिम्मेदारी बनती है, लेकिन छापेमारी केवल इंजीनियरों और ठेकेदारों के घर की जा रही है। उनके मुताबिक आईएएस पूरी तरह से बचाए जा रहे हैं। कहा गया कि हमेशा से घोटालो में यही होता है। आईएएस लाॅबी को बचाया जाता रहा है।

कहा गया कि तत्कालीन प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल इस मामले में सबसे बड़े जिम्मेदार थे। दीपक सिंघल के पास रिवर फ्रंट निर्माण के दौरान प्रमुख सचिव सिंचाई का जिम्मा रहा। वह कुछ समय मुख्य सचिव भी रहे थे। वे विभागाध्यक्ष थे मगर उनकी जिम्मेदारी नहीं तय की गई। वहीं लखनऊ के तत्कालीन जिलाधिकारी राजशेखर इस परियोजना की पल पल की रिपोर्ट रखते थे और लगातार दौरे करते थे।

बताया गया कि वे राजधानी में उस समय के शासकीय प्रोजेक्ट के मुख्य पर्यवेक्षक थे। बावजूद इसके घटिया निर्माण और धीमी गति से काम उनके सामने होता रहा। बताया गया कि तत्कालीन प्रमुख सचिव वित्त ने भी अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से नहीं निभाया और वे बजट लगातार पास करते गए।

कहा गया कि जैसे जैसे बजट पास करने के लिए कहा गया,बिना पूर्व कार्यों के उचित विश्लेषण के बजट पास किया जाता रहा। बहरहाल मामले को लेकर सीबीआई की जांच तेज होती दिख रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि इसमें कई और नामों के खुलासे हो सकते हैं।
 


संबंधित खबरें